रायपुर। कुछ दिन केवल तारीख़ नहीं होते, वे इतिहास बन जाते हैं। 18 जुलाई 2025 ऐसा ही एक दिन रहा, जब चैतन्य बघेल का 38वां जन्मदिन निजी उत्सव से आगे बढ़कर संघर्ष, आत्ममंथन और माटी की सेवा का प्रतीक बन गया। आम जीवन जीने की इच्छा रखने वाला वह व्यक्ति, जिसके पिता छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रहे, इन 168 दिनों में राजनीति के सबसे कठोर और कटु यथार्थ से रूबरू हुआ।
जेल की चारदीवारियों के भीतर बिताए गए ये 168 दिन केवल बंदीगृह का समय नहीं थे, बल्कि विचारों की आज़ादी का दौर थे। किताबों के पन्नों में सरदार पटेल की दृढ़ता, पंडित नेहरू की शालीनता और महात्मा गांधी की सत्य-अहिंसा की चेतना ने चैतन्य को यह सिखाया कि जो मिट्टी की सेवा करता है, उसे उसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है। यह कीमत प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष—उन्होंने और उनके परिवार ने उसे स्वीकार किया।
लेकिन इन 168 दिनों में एक बात नहीं बदली—झुकने से इनकार।
ना उन ताकतों के आगे जो जल-जंगल-जमीन की बात नहीं सुनना चाहतीं,
ना उनके आगे जो छत्तीसगढ़ी अस्मिता की आवाज़ दबाना चाहतीं।
चैतन्य बघेल ने लिखा—
“षड्यंत्र कितना भी जटिल हो, एक न एक दिन क़ानून और संविधान के आगे उसे विफल होना ही पड़ता है।”
यह 168 दिनों का सफ़र, जो उनके जन्मदिन से शुरू हुआ, 3 जनवरी 2026 को उनके बेटे विवांश के जन्मदिन पर समाप्त हुआ, जब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से शराब घोटाले से जुड़े दो मामलों में उन्हें जमानत मिली और वे रायपुर सेंट्रल जेल से रिहा हुए। यह संयोग समर्थकों के लिए भावनात्मक क्षण बन गया।
राजनीति के रंग, प्रतिक्रियाओं के स्वर
कांग्रेस ने इस रिहाई को “सत्य की जीत” बताया।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा—
“सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं।”
उन्होंने प्रवर्तन निदेशालय और राज्य एजेंसियों पर राजनीतिक प्रताड़ना का आरोप लगाया। टी.एस. सिंह देव सहित अन्य नेताओं ने भी कार्रवाई को दुर्भावनापूर्ण बताया।
वहीं बीजेपी ने संयमित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जमानत का अर्थ निर्दोषता नहीं होता और जांच जारी रहेगी। प्रवक्ता सचिनंद उपासने ने इसे सामान्य कानूनी प्रक्रिया बताया।
जेल के बाहर का दृश्य अलग ही कहानी कह रहा था—ढोल-नगाड़े, नारे, आतिशबाज़ी और भावुक समर्थक। राजनीति वहां भावनाओं में घुल गई थी।
“ना डरे थे, ना डरेंगे”
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने इसे ओछी राजनीति से प्रेरित कार्रवाई बताया और कहा कि सत्ता में बैठे लोग छत्तीसगढ़ की संपदा अपने गैर-राजनीतिक मित्रों और दलालों को सौंपने के लिए आतुर हैं।
उन्होंने स्पष्ट कहा—
“भूपेश बघेल और चैतन्य बघेल निडर हैं, निर्भीक हैं। न डरेंगे, न झुकेंगे।”
अंत नहीं, एक नई शुरुआत
यह रिहाई किसी कहानी का अंत नहीं, बल्कि एक नई राजनीतिक और वैचारिक शुरुआत मानी जा रही है। 168 दिनों की सीख, जेल की दीवारों के भीतर पनपी सोच और माटी के प्रति प्रतिबद्धता—यह सब चैतन्य बघेल के शब्दों में एक संकल्प बन चुका है।
“ना झुके थे, ना झुकेंगे।
ना डरे थे, ना डरेंगे।
पूरा प्रदेश खड़ा है संग साथ में—
जीतने के बाद ही अब कदम रुकेंगे।”